Cancel Preloader
Anjangaon Surji
+91 98811 90210 | 90962 79089
भाषा
अंग्रेज़ी
मराठी
भाषा
अंग्रेज़ी
मराठी
मुख्य पृष्ठ
पीठ परंपरा
श्रीदेवनाथ महास्थानम्
पीठ पुरुषों की जानकारी
श्रीदेवनाथ पीठ परंपरा से सम्बंधित स्थान
उपक्रम
मठ में आयोजित पारंपरिक कार्यक्रम
प्रेरित कार्य एवं संस्थाएं
मुख्य पृष्ठ
पीठ परंपरा
श्रीदेवनाथ महास्थानम्
पीठ पुरुषों की जानकारी
श्रीदेवनाथ पीठ परंपरा से सम्बंधित स्थान
उपक्रम
मठ में आयोजित पारंपरिक कार्यक्रम
प्रेरित कार्य एवं संस्थाएं
गैलरी
वीडियो गैलरी
फोटो गैलरी
प्रसार माध्यम – समाचार
साहित्य प्रकाशन
श्रीदेवनाथ परंपरा भजन संपदा
संपर्क
श्री देवनाथ मठ तक पहुंचने का मार्ग
गैलरी
वीडियो गैलरी
फोटो गैलरी
प्रसार माध्यम – समाचार
साहित्य प्रकाशन
श्रीदेवनाथ परंपरा भजन संपदा
संपर्क
श्री देवनाथ मठ तक पहुंचने का मार्ग
अंजनगांव सुरजी
+९१ ९८८११ ९०२१० | ९०९६२ ७९०८९
भाषा
अंग्रेज़ी
मराठी
भाषा
अंग्रेज़ी
मराठी
मुख्य पृष्ठ
पीठ परंपरा
श्रीदेवनाथ महास्थानम्
पीठ पुरुषों की जानकारी
श्रीदेवनाथ पीठ परंपरा से सम्बंधित स्थान
उपक्रम
मठ में आयोजित पारंपरिक कार्यक्रम
प्रेरित कार्य एवं संस्थाएं
गैलरी
वीडियो गैलरी
फोटो गैलरी
प्रसार माध्यम – समाचार
साहित्य प्रकाशन
श्रीदेवनाथ परंपरा भजन संपदा
संपर्क
श्री देवनाथ मठ तक पहुंचने का मार्ग
मुख्य पृष्ठ
पीठ परंपरा
श्रीदेवनाथ महास्थानम्
पीठ पुरुषों की जानकारी
श्रीदेवनाथ पीठ परंपरा से सम्बंधित स्थान
उपक्रम
मठ में आयोजित पारंपरिक कार्यक्रम
प्रेरित कार्य एवं संस्थाएं
गैलरी
वीडियो गैलरी
फोटो गैलरी
प्रसार माध्यम – समाचार
साहित्य प्रकाशन
श्रीदेवनाथ परंपरा भजन संपदा
संपर्क
श्री देवनाथ मठ तक पहुंचने का मार्ग
परम् पूज्य स्वामी श्री विश्वनाथ महाराज
Home
»
Hindi
»
पीठ पुरुषों की जानकारी
»
परम् पूज्य स्वामी श्री विश्वनाथ महाराज
पंचम पीठाधीश
परम पूज्य स्वामी श्री विश्वनाथ महाराज
(१६४९ - १७१०)
महाराज जी वाराणसी में प्रकट हुए।
महाराज जी जब तीन वर्ष के थे तभी सन् १६५२ में उनके माता-पिता इस संसार से चले गये। आगे कहा जाता है कि भगवान दत्तात्रेय ने स्वयं उनकी देखभाल की।
दत्तराज स्वामी अनाथ कैवारी। मनुजरूपे येऊनी बाळा सांभाळी।।
भिक्षेची दीक्षा दे लडिवाळी। वाढावी प्रतिपाळी विश्वंभरा ।।
(श्री दे. ली., तरंग ५)
श्रीनाथ परंपरा में उनका महान योगदान ,धर्मोद्धार के लिए निरंतर जप, तपस्या, तीर्थाटन और पर्यटन कर भजन कीर्तन द्वारा लोगों में अलख जगाया।
स. १७१० ई. ६१ वर्ष की आयु में महाराज जी ने काशी में समाधि ली।
श्रीकृष्णानंदनाथाचे वरदानी।संपली स्थिति वेगळेपणी।
गुरु-शिष्य मिरविती एकपणी। विश्वनाथ त्रिभुवनी गाजला।।
काशी के पंचगंगा घाट पर इनकी समाधि स्थित है, जिसकी देखरेख स्वामी श्री जितेन्द्रनाथ महाराज द्वारा की जाती है।