षष्ठ: पीठाधीश
परम् पूज्य स्वामी श्री मुऱ्हारनाथ महाराज
(१६५५ - १७२०)
महाराज जी के गुरु श्री विश्वनाथ महाराज से उनकी पहली मुलाकात श्रीरंगपट्टनम में हुई थी। यहीं पर उन्हें साक्षात्कार हुआ। शंकर-पार्वती, गणपति, शक्ति, नंदी के साथ शिव पंचायतन के दर्शन हुए , तथा भविष्य की कार्य योजना हेतु दिशा-निर्देश प्राप्त हुआ।
महाराज जी को सद्गुरु द्वारा दिया गया उपदेश श्री देवनाथ लीला लहरी ग्रंथ में वर्णित है।
नेमस्त आचार-विचाराविना। न सरे विषयी विवंचना।। न घडता मन बुद्धिचे समर्पण। न साधे कोणा परमार्थ।। म्हणूनी प्रपंच परमार्थ भेद विसरी। अभिलाषा कशाचीही न धरी।। सद्गुरु अन्तर्यामी नित्य स्मरी। अनिष्ट निवारी हरिनाम ।।
उत्तरार्ध में, सद्गुरु के साथ मिलकर वें जगदोद्धार करने विश्व भर की यात्रा पर अग्रसर हुएं।
सन १७२० इ. ६५ वर्ष की आयु में, उन्होंने महाराष्ट्र के चंद्रपुर में समाधी ली।
समाधि काशी और चंद्रपुर के भक्तों के सामने एक ही समय में ली गई थी, इसलिए काशी में भी समाधि है जिसकी देखरेख स्वामी श्री जितेन्द्रनाथ महाराज द्वारा की जाती है।