सप्तम: पीठाधीश
परम पूज्य स्वामी श्री रंगनाथ महाराज
(१६६१ - १७२४)
श्री रंगनाथ महाराज, समर्थ रामदास स्वामी, संत तुकाराम महाराज के समकालीन संत हैं जिनका जन्म दक्षिण भारत में हुआ था।
पूर्वाश्रमी रंगोपंत जी, छत्रपति शिवाजी महाराज के दरबार में शीलेदार थे। समर्थ रामदास स्वामी उन्हें हमेशा अपने पास बैठाते थें। श्री सद्गुरु मुऱ्हारनाथ महाराज से उनकी पहली मुलाकात रायगढ़ में हुई थी।
बाद में सद्गुरु द्वारा महाराज को योगपट्टाभिषेक से पवित्र किया गया और वें अगले पीठाधीश बने।
एक अवसर पर महाराज जी ने भिक्षाटन का महत्व और भगवान दत्तात्रेय का वचन याद कराते हुए, राजसम्मान को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। इससे सभी को यह समझ में आ गया कि पारंपरिक प्रासादिक झोली कोई साधारण नहीं है अपितु कृपाप्रसाद की कामधेनु है।
एक अवसर पर महाराज जी ने भिक्षाटन का महत्व और भगवान दत्तात्रेय का वचन याद कराते हुए, राजसम्मान को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। इससे सभी को यह समझ में आ गया कि पारंपरिक प्रासादिक झोली कोई साधारण नहीं है अपितु कृपाप्रसाद की कामधेनु है।
ऐसा कहा जाता है कि श्री रंगनाथ महाराज नवनाथों के मछिंदरनाथ महाराज और श्री गोपालनाथ महाराज श्री गोरक्षनाथ महाराज के अवतार हैं।
सहज समागम हो प्रेमाचा । काही काळ जय परिचयाचा । पाहोनि पूर्ण अधिकार पंतांचा। बोध महावाक्याचा घडे।।