त्रयोदश पीठाधीश
परम पूज्य स्वामी श्री रामकृष्णनाथ महाराज
(१८५१–१८९१)
आपका प्राकट्य ई.स. १८२२ में नागपुर स्थित अंधारे कुल में हुआ। आपकी कुलमाता श्री देवनाथ महाराज की प्रत्यक्ष उपदिष्ट शिष्या थीं। स्वामी श्री दयालनाथ महाराज ने संकेत दिया था कि श्रीदेवनाथ महाराज चतुर्थ पीढ़ी में पुनः प्रकट होकर अपने कार्य को पूर्ण करेंगे। श्रीदेवनाथ महाराज द्वारा निजधाम गमन से पूर्व वाराणसी निवासी संत मारुतीबुवा को समर्पित की गई हनुमंत मूर्ति को, आपने गुरुआज्ञा से पुनः प्राप्त कर मठ में प्रतिष्ठित किया।
ई.स. १८५१ में ग्वाल्हेर में आपका पट्टाभिषेक सम्पन्न हुआ। चालीस वर्षों की तपस्वी कार्यकारिणी में आपने मठ परंपरा का भारतभर में विस्तार किया।
शिरसगांव में कुछ समय निवास कर वहाँ की मठव्यवस्था सुदृढ़ करने के पश्चात् आपने अंजनीग्राम स्थित श्रीदेवनाथ मठ में पुनः निवास किया।
आपकी दिव्य भस्मोदूलित कांति, वैराग्यमय दृष्टि और दत्त साक्षात्कार युक्त आभा के दर्शनार्थ श्रद्धालु दूर-दूर से पधारते थे। शके १७४४ चैत्र कृष्ण अष्टमी को आपने समाधि ली।