पञ्चदश: पीठाधीश
परम पूज्य स्वामी श्री मारोतिनाथ महाराज
(१८८२- १९३०)
आपका प्राकट्य खोलापूर जिला अमरावती के खालकुनीकर( गोत्र कौंडिन्य ) परिवार में हुआ। व्यवसाय से यह परिवार हरदास , बाद में यह परिवार उमरेड ग्राम में बस गया।
बालक मारोति को सद्गुरु श्रीभालचंद्रनाथ जी का प्रथम दर्शन उमरेड के चैतन्येश्वर महादेव मंदिर में हुआ।
इस समय सद्गुरु श्री भालचंद्रनाथ जी ने उनसे कहा "हमारे पास आपके लिए दिव्यज्ञान का खजाना रखा है जो आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।आपको अंजनीग्राम, हमारे मठ में आना होगा। जहां लोग पीढ़ियों से इसके लिए तरस रहे हैं।"
इस दिव्य आह्वान के बाद, वे मठ में आगए, आध्यात्मिक दीक्षा प्राप्त की और अपने गुरु की सेवा में पूरी तरह से समर्पित हो गए।
सन १९११ इ. में प.पू.भालचन्द्रनाथजी के निर्वाण के बाद, उनके वचनानुसार पट्टभिषेक कर पीठाधीश के रूप में नियुक्त किया गया। अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने मठ की आंतरिक संरचना को मजबूत करने, इसकी भूमि का प्रबंधन करने और मंदिर के जीर्णोद्धार , विस्तार आदि महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए अथक प्रयास किये।
श्री मारोतिनाथ महाराज ने सादगी, अनुशासन, प्रेम और निस्वार्थ सेवा का जीवन जिया। उनका हृदय करुणा से भरा था और वे सभी के आध्यात्मिक उत्थान के लिए गहराई से प्रतिबद्ध थे।
भक्ति जागरण ,प्रवचनों, भजनों और कीर्तनों के माध्यम से, वें हमेशा गुरु वचनों में दृढ़ विश्वास , स्वयं की सुख-सुविधाओं का विचार न करते हुए, भक्तों से अपने अहंकार को त्यागने और अपने सच्चे स्व को महसूस करने का आग्रह करते थें। "विकल्प जाणावा तो महाप्रलय। तेणे श्रद्धा सद्भावाचा होई लय। अहंकार मी पण नाचे थयथय । स्वहित कार्य हानी हो ।।(श्री दे.ली.३३, ३४)"
सन १९३० इ. में अधिक आषाढ़ कृष्ण द्वादशी को स्वामी श्री मारोतिनाथ महाराज ने समाधि ली।