सप्तदश: पीठाधीश
परम पूज्य स्वामी श्री मनोहरनाथ महाराज
(१९३३ - २०००)
सप्तदश: पीठाधीश
परम पूज्य स्वामी श्री मनोहरनाथ महाराज
(१९३३ - २०००)
मायबाई (गुरुमाता)
ब्रम्हलीन श्रीनाथशक्ति श्रीस्वरुपा उज्वला- माता गुरुमनोहरनाथ
आपका प्राकट्य स.१९३३ ई. कुष्माण्ड नवमी नागपुर स्थित दीवान परिवार में हुआ था।
व्रतबंध संस्कार पूर्ण करने के बाद १० वर्ष की आयु में पहली बार आपको सद्गुरु श्री गोविन्दनाथ महाराज का दर्शन हुआ। आपका मूल नाम विनायक था, लेकिन सुगंधित सुनहरे बाल, विशाल मस्तक, नेत्रों में अभिनव शांति, मधुर आवाज और हनुमान के समान तेजस्वी कांति के कारण उन्हें मनोहर नामाभिधान प्राप्त हुआ।
तपस्या में लीन होने के कारण उन्हें पूर्व के चार पीठाधीश्वरों के दर्शन हुए तथा समाधि अवस्था में अपने होने का भी दर्शन हुआ। स्वयं भगवान श्रीदत्तात्रेय के साक्षात्कार में आपको भगवान दत्तात्रेय ने भविष्य की कार्य-योजना का दिशानिर्देश दिया।
सन १९६० ई. वैशाख शुद्ध दशमी को आपका योग पट्टाभिषेक समारोह सम्पन्न हुआ।
आपकी पुस्तकों का विशाल संग्रह आज भी उपलब्ध है, जिसमें नाथ साधकों को उपदेशित सन्मार्ग- शतपाऊली , श्री देवनाथ-चरित्र पर आधारित उपन्यास, नाथ फकीर और पारायण पुस्तकें, विभिन्न कथाएं, आरतीयां ,पद, भक्ति भजन आदि शामिल हैं।
आपके द्वारा श्रीनाथ सखा साधक वृन्द नामक आध्यात्मिक संगठन की स्थापना हुई जिसकी विभिन्न शाखाएं भारत में कार्यरत हैं। सामुदायिक नियमित प्रार्थनाएँ, साप्ताहिक पूजन, शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन शिविर, वार्षिक उत्सव आदि आजतक पूर्ववत कार्यशील हैं।
जिस प्रकार श्रीदेवनाथ महाराज को पेशवाओं के दरबार में सम्मान प्राप्त हुआ था। उसी प्रकार आपको भी सन २००० इ. में पेशवा सम्मान प्राप्त हुआ।