नवम पीठाधीश
परम पूज्य स्वामी श्री गोविन्दनाथ महाराज
(प्रथम) (१७२२-१८१२)
आपका प्राकट्य संत मोरया गोसावी के कुल में चिंचवड, पुणे, महाराष्ट्र के श्री चिंचवडकर देव के वंश में हुआ । वें गोरक्षनाथ जी के अवतार थे।
उनकी पहली मुलाकात अपने गुरु श्री गोपालनाथ से कोल्हापुर के श्री महालक्ष्मी मंदिर में हुई। वें भगवान दत्तात्रेय के आदेश पर और श्री गोपालनाथ श्री रंगनाथ के आदेश पर यहां आए थे।
गोपाळा स्मरे रंगनाथ वचन। चिंचवड़ी गोविंद देव कुलोत्पन्न । भावी पुरुष परंपरे भूषण। गोविंदा देव कुलोत्पन्न । (श्री दे .ली . तरंग ६)
समयों उपरांत, त्रिपुटी में सद्गुरु द्वारा अपका योगपट्टाभिषेक समारोह संपन्न किया गया ।
आपने देव, देश और धर्म के प्रचार के लिए पूरे भारतवर्ष का भ्रमण किया। तीर्थयात्रा के दौरान, उन्हें भगवान दत्तात्रेय द्वारा अगले पीठाधीश चयन हेतु संकेतात्मक आदेश दिया गया ।
दत्त सांगती श्रीनाथयासी । प्रत्यक्ष हनुमंत जन्मले भूलोकासी। राजेश्वराचे द्वितीय पुत्र रुपेसी । पुढती परंपरा वारसा ।।
इस तरह आपने समय उपरांत श्री देवनाथ महाराज को दीक्षित किया।
आपकी ग्रंथ रचनाएं, स्वानंदी, निजानंदी और विट्ठल विजय महाकाव्य जैसी विभिन्न ग्रंथसूचियां आज भी उपलब्ध हैं।
सन १८१२ इ. मे उन्होंने श्रीक्षेत्र बऱ्हानपुर में संजीवन समाधि ली।