एकादश: पीठाधीश
परम पूज्य स्वामी श्री दयालनाथ महाराज
(१७८४ - १८३७)
आपका प्राकट्य मुर्तिजापुर, जिला-अमरावती के देशमुख परिवार में वैकुंठ चतुर्दशी को हुआ । वास्तव में भगवान विष्णू इस रुप में धर्मोद्धार के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। आपका प्रकट स्थल स्मारक मूर्तिजापुर के विट्ठल मंदिर में है।
व्रतबंध उपरांत भगवान दत्तात्रेय की आज्ञा के अनुसार उन्होंने श्रीक्षेत्र माहुर बद्रीकावन में तपस्या की। आप भगवान श्री नारायण के अवतार थे।
आपके मृदु स्वभाव,नम्रता ,सरलता , दया, करुणा से प्रभावित होकर दादा गुरुजी (श्रीहरि) को 'दयाल' कहकर पुकारते थे, बाद में वे इसी "दयालनाथ" नाम से विख्यात हुए ।
आपके कीर्तन में वेदांत, भक्ति और मोक्ष का सुअवसर था। अपके साहित्य का विशाल भंडार आज उपलब्ध है।
लोगों के प्रति निरंतर अच्छी सेवा और भक्ति, गुरु के प्रति सर्वोच्च भक्ति, सभी के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार और जीवन में ईश्वर से साक्षात्कार आदि कई आदर्श आपके जीवनी में दिखाई देते हैं।
लोगों के प्रति निरंतर अच्छी सेवा और भक्ति, गुरु के प्रति सर्वोच्च भक्ति, सभी के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार और जीवन में ईश्वर से साक्षात्कार आदि कई आदर्श आपके जीवनी में दिखाई देते हैं।