चतुर्दश: पीठाधीश
परम पूज्य स्वामी श्री भालचंद्रनाथ महाराज
(१८७२-१९११)
आप सन १८७२ इ. शिरपुर, जिला वर्धा के देशमुख परिवार में प्रकट हुए।
समयों उपरांत उन्हें सद्गुरु श्री रामकृष्णनाथ महाराज का कृपाशीर्वाद प्राप्त हुआ।
कालांतर से उन्हें भगवान श्री गणेश के साक्षात दर्शन हुए और भगवान गणेश के आदेशानुसार, वे मोर्शी तालुका के खेड़ स्थित प्राचीन गणेश मंदिर गये और फिर नील पर्वत पर जाकर तपस्या पूर्ण की।
नील पर्वत पर सात वर्षों तक तपस्या करने के बाद आपको भगवान श्री दत्तात्रेय के दर्शन हुए। भगवान श्री दत्तात्रेय के कृपा से सकल शास्त्र, विद्या, कला का ज्ञान आपको प्राप्त हुआ।
आपके कार्यकाल मे अखंड भजन, कीर्तन, अगम्य ज्ञान, भक्ति-लीला एवं विभिन्न राजाओं, सरदारों, उमरावों का समर्पण आदि से समृद्ध था।
सद्गुरु की आज्ञा से भालचन्द्रनाथ जी ने श्रीदेवनाथ महाराज का विस्तृत जीवन-चरित्र लिखा।
सन १९११ इ.पंढरपुर में श्रीविट्ठल मंदिर के पास चंद्रभागा नदी के तट पर आपने समाधि ली । आज भी चंद्रभागा के तट पर पुंडलिक मंदिर के पैढ़ी पर भालचंद्रनाथ जी का नाम अंकित है।