प्रथम पीठाधीश
परम पूज्य श्री जनार्दन स्वामी महाराज
(१५०५ - १५७६)
श्री जनार्दन स्वामी का अवतरण फाल्गुन कृष्ण षष्ठी, शक सं. १४२६ (सन १५०५ ई.) को चालीसगाँव, महाराष्ट्र के देशपांडे कुल में हुआ। आप भगवान दत्तात्रेय के अवतार थे।
पूर्वाश्रम में आपने दौलताबाद किले के किलेदार के रूप में भगवान दत्तात्रेय के आदेश पर 41 वर्षों तक तपस्या का दायित्व संभाला।
स्वामीजी, जो स्वभाव से आध्यात्मिक थे, नियमित रूप से ध्यान के लिए किले पर स्थित गोरक्षन गुफा में जाते थे, और हर गुरुवार को शूलभंजन पर्वत पर जाना उनका नियम था।
शक सं १४५७ में स्वामीजी को भगवान दत्तात्रेय का दर्शन हुआ और उन्हें भविष्य के कार्य करने का निर्देश मिला।
स्वामीजी ने औदुंबर, नरसोबा वाडी और अंकलखोप जैसे कई दत्त संप्रदाय तीर्थ स्थलों का दौरा किया और तपस्या की। ऐसा कहा जाता है कि नृसिंहसरस्वती स्वामी महाराज ने साक्षात् दर्शन देकर उनसे तपस्या करवाई थी।
भगवान दत्तात्रेय ने अपना स्वरूप उन्हें प्रदान कर श्रीनाथ पीठ की स्थापना के लिए प्रेरित किया। इसके साथ ही श्री दत्तात्रेय ने अत्रिऋषि के आश्रम में उन्हें धर्मदण्ड, कंठी, रुद्राक्ष-माला और भिक्षाझोली आदि राजसी चिन्ह प्रदान कर गृहस्थाश्रमी संप्रदाय के पीठोद्धार करने का आदेश दिया।
आज भी ये भव्य वस्तुएं श्री देवनाथ मठ के दर्शन कक्ष में देखी जा सकती हैं।
आपके ग्रंथों का विशाल संग्रह है जिनमें अभंगरचना के विशाल भंडार के साथ वेदान्त पर आधारित 'भगवद्गीता' प्रसिद्ध ग्रंथ है।
जनार्दन स्वामी के १२ प्रमुख शिष्यों का वर्णन मिलता है, जिनमें शांतिब्रह्म एकनाथ (पैठन), जनी जनार्दन (बीड), रामा जनार्दन आदि शामिल हैं।
मार्गशीर्ष वद्य एकादशी, शक सं.१४९७ (सन १५७६ ई.) को उन्होंने देवगिरि किले पर गोरक्ष गुफा में योग समाधी ली ।